चंडी देवी मंदिर का इतिहास जानकर गर्व करेंगे हिंदू होने पर

चंडी देवी मंदिर का इतिहास जो की बहुत ही पुराना है। तीर्थ स्थानों में से एक है।यहां पर लोग आए दिन बड़ी तादाद में आते हैं तथा यहां पर देवी की महिमा के भी बहुत गुणगान हैं। माता रानी सभी की मनोकामना पूर्ण करती है तथा यह बहुत प्राचीन मंदिर होने के साथ-साथ बहुत ही विश्वसनीय मंदिरों में से भी एक है। मां चंडी देवी मंदिर हरिद्वार में स्थित है।

चंडी देवी मंदिर का इतिहास

लोगों का मानना है कि जो भी यहां श्रद्धा से मां के दर्शन के लिए आता  है उसकी मनोकामना मां चंडी देवी पूरी करती है। यह माता रानी का इकलौता ऐसा मंदिर है।जहां मां चंडी खंभ के रूप में स्वयं प्रकट हुई थी। यहां पर माता का क्रोध वाला स्वरूप देखने को मिलता है

तथा माता के बगल में एक स्वरूप शांति दुर्गा का भी देखने को मिलता है। यह मंदिर काफी प्राचीन हिंदुओं के मंदिरों में से एक है क्योंकि बहुत ही आस्था से भरपूर मंदिर है। यह मंदिर हिमालय के सबसे दक्षिणी पर्वत श्रृंखला शिवालिक पहाड़ियों के पूर्वी शिखर में नील पर्वत के ऊपर स्थित है।Badrinath Temple History in Hindi

चंडी देवी मंदिर का इतिहास
चंडी देवी मंदिर का इतिहास

हरिद्वार में पंच तीर्थ में से यह एक तीर्थ स्थान है। यह मंदिर सिद्ध पीठ के रूप में अत्यधिक पूजनीय स्थान है। हरिद्वार में यह मंदिर मां चंडी देवी का पौराणिक मंदिर है। यहां मां चंडी के दो रूपों को देखा जाता है। जो की एक बहुत ही क्रोधी रूप है तथा दूसरा बहुत शांत रूप है।

यहां पर मां चंडिका ने शंभू और निशुंभ राक्षसों का वध किया था। लोगों की आस्था और लोगों की मनोकामना  मंदिर में बहुत ही जल्द पूर्ण होती है।यहां लोगों की बहुत ही ज्यादा भीड़ उमड़ती है। देश के कोने-कोने से श्रद्धालु अपनी मन्नते लेकर देवी के चरणों में आते हैं तथा माता के दरबार में हाजिरी लगाते हैं।

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माता चंडी का मंदिर हरिद्वार में स्थित 3 पीठो में से एक है तथा दो अन्य पीठ मनसा देवी और माया देवी मंदिर है। मां चंडी का यह मंदिर 100 सालों से भी अधिक पुराना बताया जाता है।मंदिर में मौजूद मूर्ति आठवीं शताब्दी में आदि शंकराचार्य द्वारा स्थापित की थी।

जानकारी के लिए हिंदू धर्म के सबसे महान पुजारियों में से एक थे। जो कि बद्रीनाथ ,केदारनाथ जैसे महान मंदिरों के बारे में खोज की थी। वह ऐसे महात्मा थे जिन्होंने बहुत अलग-अलग प्रकार के मंदिरों की खोज की थी। जो कि आज बहुत ही बड़े मंदिरों में से एक है।

शंकराचार्य को शिवजी का ही एक रूप भी माना जाता है। जो कि पृथ्वी पर लोगों को मंदिरों से अवगत कराने आए थे। मंदिर को नील पर्वत के तीर्थ के रूप में भी जाना जाता है।

जो की हरिद्वार के भीतर स्थित पंच तीर्थ में से एक है। पौराणिक कथाओं के अनुसार शुंभ और निशुंभ नाम के दो राक्षस थे। जिन्होंने स्वर्ग के देवता इंद्र के राज्य पर कब्जा कर लिया था‌ और देवताओं को स्वर्ग से निकाल दिया था ।

चंडी देवी मंदिर का इतिहास
चंडी देवी मंदिर का इतिहास

देवताओं के प्रार्थना के बाद माता पार्वती ने चंडी के रूप को धारण किया और दोनों राक्षसों के सामने प्रकट हुई। शुंभ और निशुंभ ने माता को साधारण महिला समझकर उनकी सुंदरता पर मोहित होकर। उनसे शादी करने की इच्छा जताई‌ इंकार करने पर शुभ ने अपनी राक्षसों से प्रमुख चंदू और मुंडा को उन्हें मारने के लिए भेजा।

लेकिन वह देवी चामुंडा के हाथों मारे गए फिर शुंभ और निशुंभ ने मिलकर चंडिका को मारने की कोशिश की लेकिन देवी की हाथों से दोनों राक्षसों का संघार हो गया।

इस मंदिर में मां त्रिशूल के रूप में विराजमान है। कहा जाता है कि नील पर्वत में चंडिका देवी थोड़ी देर आराम किया था और इसके बाद मन शांत रूप में वही विराजमान हो गई। तब इस स्थान पर माता का मंदिर बना दिया गया। इसके अलावा मंदिर शंकर में स्थित दो चोटियां है

जिनको शुभ और निशुंभ कहा जाता है। कहा जाता है कि हरिद्वार में मां मनसा देवी मध्य में ,महामाया देवी फिर मां चंडी देवी एक त्रिशूल के रूप में हरिद्वार की रक्षा करती आ रही है।त्रिशूल बनने के पीछे की मान्यता है कि तीनों देवियां पर्वत में विराजमान है। 

चंडी चौदस का है यहां पर बहुत ही बड़ा महत्व – वैसे तो माता के दरबार में पूरे साल भक्तों की बहुत ही ज्यादा भीड़ लगी रहती है। चंडी चौदस लेकिन नवरात्रियों से लेकर  चौदस तक यहां पर विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है।

जिसमें लोग बहुत ही ज्यादा बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं तथा यहां पर माता के दर्शन के लिए आते हैं।ऐसी भी मानता है कि चंडी  चौदस के दिन पृथ्वी पर मौजूद जितने भी देवी देवता है। वह सब अपनी बहन चंडी देवी से मिलने के लिए इस स्थान पर पहुंचते हैं।

चंडी देवी को माता काली के रूप की तरह माना जाता है तथा उनके उग्र रूप की भी पूजा की जाती है। अश्विन और चैत्र मास की शुक्ल प्रतिपदा में नवरात्रि में चंडी पूजा का विशेष महत्व है। यहां पर बहुत ही बड़ा कार्यक्रम समारोह के साथ मनाया जाता है।

पूजा के लिए पंडित की ओर से मंदिर के मध्य स्थान को गोबर और मिट्टी से लेकर मिट्टी की एक कलश स्थापित की जाती है।यहीं पर चंडी देवी के मंदिर के पास हनुमान जी की मां अंजनी देवी का भी मंदिर स्थित है।इस मंदिर में आने के बाद लोग अंजली देवी का मंदिर भी जरूर जाते हैं।

चंडी देवी मंदिर का इतिहास
चंडी देवी मंदिर का इतिहास

मनसा देवी और चंडी देवी माता पार्वती के ही दो अलग-अलग रूप हैं। जो कि हमेशा एक दूसरे के करीब रहती हैं। मनसा का मंदिर पर्वत पर गंगा नदी के विपरीत तट पर दूसरी ओर है क्योंकि चंडी देवी का मंदिर मन्नत पूरी करने वाले के लिए जाना जाता है।यही कारण है कि अंदर मंदिरों की अपेक्षा इस मंदिर पर भक्तों की भीड़ ज्यादा लगती है।

चंडी देवी मंदिर मैं भक्त लोगों के लिए दर्शन का समय – यह मंदिर सुबह 5:00 बजे खुलता है और रात में 8:00 बजे बंद होता है। मंदिर खुलने के बाद यहां सबसे पहले 5:30 बजे माता चंडी की आरती होती है। सुबह की आरती के बाद पूरे दिन पूजा-पाठ और दर्शन का कार्यक्रम चलता रहता है।

 भक्त लोगों की यह है‌ आस्था – यहां मंदिर में आने वाले बाहरी लोगों की जितनी आता माता के प्रति है उससे ज्यादा ही लोग यहां के स्थाई लोगों की है पंचपुरी में ऐसे काफी लोग हैं जो रोज माता चंडी के दर्शन करने आते हैं

अंकल निवासी के लोग भी माता के दर्शन के लिए आते हैं जो कि 4 किलोमीटर की खड़ी चढ़ाई को चढ़कर में माता के दर पर शीश नवाने आते हैं लोग दूर-दूर से पैदल यात्रा भी करने माता रानी के दरबार पर आते हैं।

चंडी देवी मंदिर कहां है?

कुछ साल पहले माता के प्राचीन मंदिर तक जाने के लिए करीब 4:30 किलोमीटर की कहते हैं कठिन पर डाल यात्रा करनी पड़ती थी लेकिन अब रोपवे लगने के बाद जो यात्री पैदल नहीं जाना चाहते वह रोपवे मदन से यात्रा को संपन्न कर सकते हैं।

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